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ए॒वा स॒त्यं म॑घवाना यु॒वं तदिन्द्र॑श्च सोमो॒र्वमश्व्यं॒ गोः। आद॑र्दृत॒मपि॑हिता॒न्यश्ना॑ रिरि॒चथुः॒ क्षाश्चि॑त्ततृदा॒ना ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā satyam maghavānā yuvaṁ tad indraś ca somorvam aśvyaṁ goḥ | ādardṛtam apihitāny aśnā riricathuḥ kṣāś cit tatṛdānā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व। स॒त्यम्। म॒घ॒ऽवा॒ना॒। यु॒वम्। तत्। इन्द्रः॑। च॒। सो॒म॒। ऊ॒र्वम्। अश्व्य॑म्। गोः। आ। अ॒द॒र्दृ॒त॒म्। अपि॑ऽहितानि। अश्ना॑। रि॒रि॒चथुः॑। क्षाः। चि॒त्। त॒तृ॒दा॒ना ॥५॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:28» मन्त्र:5 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर राजप्रजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) उत्तम गुणों से युक्त (मघवाना) बहुत धनों से युक्त राजा और प्रजाजनो (युवम्) आप दोनों जो (सत्यम्) सत्य (गोः) पृथिवी का (ऊर्वम्) ढाँपनेवाला (अश्व्यम्) घोड़ों में उत्पन्न हुए को प्राप्त होकर शत्रुओं को (आ, अदर्दृतम्) निरन्तर नाश करो (तत्) उसको (इन्द्रः) राजा ग्रहण करके शत्रुओं का नाश करे और जिन (अपिहितानि) घिरे हुए (अश्ना) भोग करने योग्य पदार्थों को (रिरिचथुः) छोड़ो (क्षाः, च) पृथिवियों को (चित्) भी छोड़ो, उनको प्राप्त होकर दुष्ट संबन्धी (ततृदाना) दुःख के नाश करनेवाले होवें, इस प्रकार से (एव) ऐसे ही राजा भी होवे ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो राजा, मन्त्री, सेना और प्रजाजन परस्पर में स्नेह करके राज्य शिक्षा करें तो इनका कोई भी शत्रु नहीं उपस्थित हो ॥५॥ इस सूक्त में राजा और प्रजादि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥५॥ यह अट्ठाईसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुना राजप्रजागुणानाह ॥

अन्वय:

हे सोम ! मघवाना युवं यत्सत्यं गोरूर्वमश्व्यं प्राप्य शत्रूनादर्दृतं तदिन्द्रः सङ्गृह्य शत्रून् हिंस्याद् यान्यपिहितान्यश्ना रिरिचथुः क्षाश्च चिद्रिरिचथुस्ताः प्राप्य दुष्टानां ततृदाना स्यातामेवमेवेन्द्रः स्यात् ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (एवा) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (सत्यम्) (मघवाना) बहुधनयुक्तौ राजप्रजाजनौ (युवम्) (तत्) (इन्द्रः) राजा (च) (सोम) सोम्यगुणसम्पन्नौ (ऊर्वम्) आच्छादकम् (अश्व्यम्) अश्वेषु भवम् (गोः) पृथिव्याः (आ) (अदर्दृतम्) भृशं विदारयतम् (अपिहितानि) आच्छादितानि (अश्ना) भोक्तव्यानि (रिरिचथुः) रेचताम् (क्षाः) पृथिवीः (चित्) (ततृदाना) दुःखस्य हिंसकौ ॥५॥
भावार्थभाषाः - यदि राजाऽमात्यसेनाप्रजाजनाः परस्परस्मिन् प्रीतिं विधाय राज्यशासनं कुर्य्युस्तर्ह्येषां कोऽपि शत्रुर्नोपतिष्ठेतेति ॥५॥ अत्रेन्द्रराजप्रजागुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥५॥ इत्यष्टाविंशतितमं सूक्तं सप्तदशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे राजे, मंत्री, सेना व प्रजाजन परस्पर स्नेह करून राज्य शासन करतात तेव्हा त्यांचा कोणीही शत्रू नसतो. ॥ ५ ॥